देवी मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, जय माता दी के भक्तों में हुआ माहौल
मधुबनी
मां सिद्धिदात्री नवरात्रि के नौवें दिन पूजी जाने वाली मां दुर्गा की नौवीं शक्ति हैं, जो ‘पूर्णता’ (सिद्धियों) की देवी हैं। ये अष्ट सिद्धियां (अणिमा, गरिमा, लघिमा आदि) प्रदान करती हैं। कमल पर विराजमान, चार भुजाओं वाली ये देवी ज्ञान और मोक्ष की दाता हैं। पौराणिक मान्यतानुसार, भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही ‘अर्धनारीश्वर’ रूप प्राप्त किया था। हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए तो
माँ सिद्धिदात्री केतु ग्रह का प्रतिनिधित्व करती हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, नवरात्र के नौवें दिन इनकी पूजा करने से केतु के नकारात्मक प्रभावों को कम करने और आध्यात्मिक स्पष्टता प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह नवदुर्गा का अंतिम रूप है जो सभी सिद्धियों को प्रदान करता है। आयुर्वेद में माँ सिद्धिदात्री को शतावरी के रूप में जाना जाता है, जो नवदुर्गा का नौवां रूप है। यह एक महाऔषधि है जो बल, बुद्धि, वीर्य, और शारीरिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ हृदय को मजबूती प्रदान करती है। माता सिद्धिदात्री की तरह शतावरी भी त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का नाश कर समग्र स्वास्थ्य प्रदान करती है।
हवन का विशेष महत्व है नवरात्रि पूजा में
नवरात्रि में हवन (अग्नि यज्ञ) नौ दिनों की पूजा की पूर्णता और मां दुर्गा की असीम कृपा पाने का अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो आमतौर पर महाअष्टमी या महानवमी को किया जाता है। यह नकारात्मकता दूर कर सकारात्मकता, सुख-समृद्धि लाता है और अग्नि के माध्यम से देवी-देवताओं तक आहुति पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता सुनिश्चित करता है। नौ दिनों तक की गई व्रत, साधना और मंत्र जप का पूरा फल प्राप्त करने के लिए अंतिम दिन हवन करना अनिवार्य माना जाता है। पंडित पंकज झा शास्त्री के कथनानुसार हवन या यज्ञ का वैज्ञानिक महत्व मुख्यतः इसके वायु शोधक, कीटाणुनाशक और मानसिक स्वास्थ्य लाभों में निहित है। शोध बताते हैं कि आम की लकड़ी, घी और औषधीय सामग्री के दहन से उत्पन्न धुआँ 24 घंटे में 94% तक हवा के बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता है। यह एक प्रकार का एंटीसेप्टिक, एरोमाथेरेपी और श्वसन प्रणाली को स्वच्छ करने वाला प्राकृतिक उपाय है।
रामनवमी को लेकर देव मंदिरों में सजा दरबार
राम नवमी को लेकर जिला और आसपास के राम जानकी और हनुमान मंदिर में तैयारी लगभग पूरी हो गई है। इस बार श्री राम नवमी 27 मार्च शुक्रवार को मनाया जा रहा है।राम नवमी का पर्व हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के सातवें अवतार, श्री राम के जन्म के उपलक्ष्य में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई, धर्म की स्थापना और “मर्यादा पुरुषोत्तम” राम के आदर्शों (सत्य, धर्म, त्याग) का प्रतीक है। शास्त्रों (विशेषकर वाल्मीकि रामायण) के अनुसार, भगवान राम का जन्म त्रेतायुग में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से हुआ था। यह दिव्य अवतार धर्म की स्थापना, रावण के अंत और मर्यादा का पालन करने के लिए हुआ था, जिसे राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। यह वसंत नवरात्र का समापन दिवस भी है, जो आध्यात्मिक शुद्धि और शक्ति पूजा का संदेश देता है। स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने कहा कि राम नवमी केवल धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से वसंत ऋतु के चरम और सूर्य के तेज से जुड़ा है। यह मौसम परिवर्तन का समय होता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा (इम्यूनिटी) को सूर्य की ऊर्जा से मजबूत किया जाता है और शरीर को आगामी गर्मियों के लिए तैयार किया जाता है। स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर कमिटी के अध्यक्ष एवं पूर्व वार्ड पार्षद श्री कैलाश साह से बताया कि हर वर्ष की तरह इस बार भी हनुमान प्रेम मंदिर में श्री राम नवमी भव्य तरीके से मनाया जाएगा। वहीं कमिटी के सचिव राजू कुमार राज का कहना है कि अन्यवर्ष की अपेक्षा इस वर्ष भव्य तरीके से हनुमान जी का विशेष शृंगार किया जायेगा । मंदिर में आने वाले भक्तों को कोई दिक्कत न हो इस पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, राम नवमी को लेकर तैयारी अंतिम चरण में है । पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने कहा कि हनुमान जी के पूजा में श्रद्धालु भक्तों के साथ साथ स्थानीय युवा वर्ग का भी विशेष सहयोग रहता है। क्योंकि राम और हनुमान का संबंध भक्ति, निस्वार्थ सेवा, और विश्वास की सर्वोच्च मिसाल है, जो आदर्श स्वामी-सेवक का प्रतीक है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जबकि हनुमान बल, बुद्धि और भक्ति के साक्षात अवतार हैं।
नवरात्र के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा
नवरात्र के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा हर्सोल्लास के साथ किया गया, भगवती मंदिर और पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखी गई। सुबह से ही सुहागिन महिलाएं माता के खोईछा भरने के कार्यक्रम में लगी रही।मां महागौरी वे अत्यंत गोरी, शांत और सौम्य हैं, जो पवित्रता, ज्ञान और शांति का प्रतीक हैं। इन्हें ‘महागौरी’ (अत्यंत उज्ज्वल) कहा जाता है। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन के दुख-कष्ट दूर होते हैं, कन्या पूजन किया जाता है और भक्तों को सुख-समृद्धि मिलती है। श्वेत वर्ण (गोरी), शांत और सौम्य, बैल (नंदी) पर सवार,चार भुजाएं—दाएं हाथों में त्रिशूल और अभय मुद्रा, बाएं हाथों में डमरू और वरद मुद्रा,सफेद वस्त्र और आभूषण धारण करती हैं। पंडित पंकज झा शास्त्री ने कहा कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या के कारण माता पार्वती का शरीर काला पड़ गया था, लेकिन शिवजी ने गंगाजल से उन्हें धोया, जिससे वे अत्यंत गौरी (गोरी) हो गईं।महागौरी की आराधना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यह स्वरूप धन, सुख, सौभाग्य और आरोग्यता प्रदान करने वाला माना जाता है।नवरात्र के दौरान महिलाएं माता दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से ‘खोइछा’ (आंचल)भरती हैं। यह एक पारंपरिक अनुष्ठान है जिसमें सुहाग की वस्तुएं, सिंदूर, चावल और फूल आदि माता के आंचल में समर्पित किए जाते हैं, जिससे घर में सुख-समृद्धि, सुख-शांति और सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद मिलता है।
नवरात्र में कन्या पूजन (कंजक पूजन) का अत्यधिक धार्मिक महत्व है, जिसमें 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों का साक्षात रूप मानकर पूजा जाता है। यह अनुष्ठान अष्टमी या नवमी को देवी की कृपा, घर में सुख-समृद्धि, और पवित्रता प्राप्ति के लिए किया जाता है। कन्याओं को भोजन कराकर, पैर धोकर और उपहार देकर सम्मानित किया जाता है, जो नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नारी शक्ति को सम्मान देने, मनोवैज्ञानिक विकास और पोषण से जुड़ा है। 2-10 वर्ष की कन्याएं सर्वोच्च सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं। यह रस्म बच्चियों को पोषण (हलवा-पूरी) देकर सामाजिक और शारीरिक स्वास्थ्य में योगदान करती है, साथ ही समाज में लैंगिक समानता का संदेश देती है।
