माता दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना अत्यंत हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ की गई
पूजा अर्चना करते पंडित
मधुबनी
शारदीय नवरात्रि के छठे दिन जिला और आसपास के ग्रामीण इलाकों में माता दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना अत्यंत हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ की गई। श्रद्धालुओं ने सुबह से ही पूजा पंडालों और मंदिरों में पहुंचकर माता के दर्शन किए और विशेष पूजा-अर्चना की।षष्ठी तिथि को देवी दुर्गा के आवाहन के लिए पारंपरिक रूप से बेल के पेड़ को आमंत्रित करने की रस्म निभाई गई।मंत्रोच्चार और आरती: मंदिरों और पूजा समितियों द्वारा सुबह-शाम विशेष आरती और दुर्गा सप्तशती के पाठ किए जा रहे हैं, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया है।स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि
मिथिला की प्रसिद्ध दुर्गा पूजा में बेलनौती (जिसे विल्वाभिमंत्रण’भी कहा जाता है) माता दुर्गा को पृथ्वी पर पधारने के लिए आमंत्रित करने की एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य सांस्कृतिक परंपरा है। इस प्रक्रिया में आचार्य और श्रद्धालु गाजेबाजे और डोली के साथ बेल वृक्ष के पास जाकर और जोड़ा बेल वाले वृक्ष के पास विशेष पूजा किया गया ।क्योंकि बेल के पेड़ को भगवान शिव और देवी भगवती का साक्षात निवास स्थान माना जाता है। श्रद्धालु, महिलाएं और आचार्य पारंपरिकमैथिली देवी गीतों (भगवती वंदना), शंख ध्वनि और ढाक-ढोल के साथ पूजा पंडाल से बेल वृक्ष की ओर प्रस्थान करते हैं। इस दौरान एक प्रतीकात्मक डोली साथ ले जाई जाती है, दुर्गा पूजा के दौरान नवपत्रिका प्रवेश महासप्तमी के दिन किया जाने वाला एक प्रमुख अनुष्ठान है, संस्कृत में ‘नव’ का अर्थ नौ (9) और ‘पत्रिका’ का अर्थ पत्तियाँ या पौधे होता है। इसमें नौ अलग-अलग प्रकार के पौधों और पत्तियों को एक साथ बांधकर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है।महा सप्तमी के दिन आचार्य पंडित विद्वानों और पूजा समिति के सदस्य एवं श्रद्धालु भक्त जिस जिस बेल वृक्ष को षष्ठी में निमंत्रण दिये रहते है उस वृक्ष का विशेष पूजा आरती कर आचार्य द्वारा बेल तोड़ी की प्रक्रिया कर जोड़े बेल को माँ दुर्गा स्वरूप मानकर डोली बैठा कर गाजे बाजे ढोल नगाड़े के साथ माता के जय कारे लगाते हुए पूजा पंडाल तक लाया जाता है द्वार पर विशेष पुजा उपरांत नवपत्रिका प्रवेश के साथ ही भक्तों के लिए माता का दर्शन हेतु पट खोल दिए जाते है।मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि की अवधारणा को आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक गहरे प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सनातन धर्म के प्रतीकों में छिपे वैज्ञानिक और प्रकृति-संबंधी पहलुओं को समझा जा सकता है, पंडित पंकज झा शास्त्री ने कहा कि माँ कालरात्रि, जो देवी दुर्गा का सातवाँ और सबसे उग्र स्वरूप हैं, उनका आध्यात्मिक पहलू गहरे रहस्य, आंतरिक परिवर्तन और भय से मुक्ति का प्रतीक है।
ज्योतिष के अनुसार, मां कालरात्रि की उपासना से कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैया और शनि के प्रतिकूल प्रभावों का नाश होता है।भय और नकारात्मकता से मुक्ति: यह देवी अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं। इनकी पूजा से भूत, प्रेत, शत्रु, अकाल मृत्यु और किसी भी प्रकार के अज्ञात भय से रक्षा होती है।प्राणी मात्र में मां कालरात्रि ‘सहस्रार चक्र’ में निवास करती हैं। इस चक्र पर ध्यान केंद्रित करने से साधक को ब्रह्मांड की सिद्धियों और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इनका स्वरूप भले ही अत्यंत विकराल (काला रंग, खुले बाल, तीन नेत्र और गधा वाहन) है, लेकिन ये अपने भक्तों को हमेशा शुभ फल देने वाली ‘शुभंकरी’ कहलाती हैं।
महा सप्तमी तिथि शनिवार की रात्रि के अंतिम पहर 06 बजकर 05 मिनट तक इसके बाद अष्टमी तिथि आरम्भ। शनिवार को महा सप्तमी व्रत है।
